हर पात्र गरीब को मिलेगा राशन कार्ड: संकल्प सभागार में सीएम सम्राट चौधरी की खाद्य विभाग पर बड़ी बैठक, जनवितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने का सख्त निर्देश!

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने लोक सेवक आवास स्थित 'संकल्प' सभागार में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की समीक्षा बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को पात्र गरीब परिवारों के राशन कार्ड जल्द बनाने और जनवितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने का निर्देश दिया, ताकि सरकारी अनाज सही लाभुक तक बिना गड़बड़ी के पहुंचे।

लोक सेवक आवास के 'संकल्प' सभागार में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, साथ में राशन कार्ड और जनवितरण प्रणाली का प्रतीकात्मक चित्र
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की समीक्षा बैठक में पात्र गरीब परिवारों के राशन कार्ड शीघ्र बनाने और जनवितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के निर्देश दिए।

पटना: बिहार में करोड़ों परिवारों की रसोई सीधे जिस विभाग से जुड़ी है, उस खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी नजर और कड़ी कर दी है। लोक सेवक आवास स्थित 'संकल्प' सभागार में हुई विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में निर्देश दिया कि पात्र गरीब परिवारों के राशन कार्ड बिना देरी के बनाए जाएं और जनवितरण प्रणाली यानी PDS की पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए। संदेश सीधा था: जिसे राशन का हक है, उसे मिले, और जिसे नहीं है, वह व्यवस्था में घुसपैठ न कर सके।

बैठक का केंद्रीय संदेश: हक का अनाज, हक वाले को

बिहार में राशन कार्ड केवल एक दस्तावेज नहीं है। गरीब परिवारों के लिए यह सस्ते या मुफ्त अनाज का भरोसा है, और कई मामलों में पहचान और निवास का एक अहम प्रमाण भी। इसलिए जब किसी पात्र परिवार का कार्ड महीनों तक अटका रहता है, तो असर उसकी रोजमर्रा की थाली पर पड़ता है। मुख्यमंत्री ने इसी बिंदु पर जोर दिया कि राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया में किसी पात्र को चक्कर न लगाने पड़ें।

साथ ही उन्होंने जनवितरण प्रणाली में पारदर्शिता को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया। अनाज गोदाम से निकलकर राशन दुकान तक और फिर लाभुक के हाथ तक पहुंचने की पूरी श्रृंखला में हर कड़ी की जवाबदेही तय होनी चाहिए, यही बैठक का सार रहा।

राशन कार्ड बनाने की रफ्तार पर सवाल और निर्देश

बैठक में अधिकारियों से राशन कार्ड के लंबित आवेदनों की स्थिति पूछी गई। आम तौर पर आवेदन के बाद सत्यापन, ई-केवाईसी, आधार से जोड़ने और अंतिम स्वीकृति जैसे कई चरण होते हैं, और हर चरण पर देरी की गुंजाइश रहती है। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि जांच-पड़ताल की प्रक्रिया समयबद्ध हो और पात्र परिवारों के कार्ड शीघ्र बनकर उनके हाथ में पहुंचें।

यह निर्देश सिर्फ गति बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सही लोगों को जोड़ने के लिए भी है। पात्रता की जांच इसलिए जरूरी है कि सीमित संसाधनों का लाभ वही उठा सकें, जिनके लिए योजना बनी है।

पारदर्शिता का मतलब क्या है

पारदर्शिता शब्द सुनने में भारी लगता है, लेकिन जमीन पर इसके मायने साफ हैं। इसका मतलब है कि राशन दुकानदार को कितना अनाज मिला, उसने किसे कितना दिया, और किसके नाम पर कितना उठाव हुआ, यह सब रिकॉर्ड में दर्ज हो और जांचा जा सके। ई-पॉस मशीन से अंगूठे या आधार से सत्यापन, ऑनलाइन निगरानी और शिकायत निवारण की सुविधा इसी व्यवस्था का हिस्सा मानी जाती है। जब रिकॉर्ड साफ होता है, तो फर्जी लाभुकों के नाम पर अनाज की हेराफेरी की गुंजाइश घटती है।

जनवितरण प्रणाली की जमीनी चुनौतियां

PDS में शिकायतें नई नहीं हैं। कभी लाभुकों को कम अनाज मिलने की बात सामने आती है, तो कभी दुकान खुलने के तय समय को लेकर शिकायतें होती हैं। कई बार पात्र परिवारों के नाम सूची में नहीं होते, जबकि कुछ अपात्र लोगों के नाम दर्ज बताए जाते हैं। राज्य के खाद्य विभाग ने पहले भी अपनी राज्यस्तरीय समीक्षा बैठकों में संदिग्ध राशन कार्डों की जांच, शिकायत निवारण और राशन वितरण में गड़बड़ी पर कार्रवाई पर जोर दिया है। मुख्यमंत्री की ताजा बैठक को उसी कड़ी में शीर्ष स्तर के राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

पहले भी दिखी है मुख्यमंत्री की इस विषय पर दिलचस्पी

राशन कार्ड और PDS का मुद्दा मुख्यमंत्री के एजेंडे में पहली बार नहीं आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ महीने पहले उन्होंने इसी 'संकल्प' सभागार में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी के साथ बैठक की थी। उस बैठक में खाद्य सुरक्षा, PDS को अधिक मजबूत, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी। उसी दौरान एक करोड़ नए राशन कार्ड बनाने जैसे बड़े लक्ष्य की खबरें भी सामने आई थीं। कहा गया था कि सरकारी योजनाओं का फायदा जरूरतमंदों तक समय पर और बिना भ्रष्टाचार के पहुंचना चाहिए। ताजा बैठक उसी दिशा की निरंतरता के रूप में सामने आई है।

राज्य के खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री अशोक चौधरी ने पदभार संभालने के समय कहा था कि यह विभाग राज्य के करोड़ों लोगों के जीवन से सीधे जुड़ा है। उन्होंने बताया था कि बिहार में राशन कार्ड लाभार्थियों की संख्या आठ करोड़ से अधिक है। उन्होंने प्राथमिकता यह भी बताई थी कि कोई भी योग्य और जरूरतमंद परिवार राशन कार्ड के लाभ से वंचित न रहे, और 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग कार्डधारियों तक घर पर राशन पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। मुख्यमंत्री की ताजा समीक्षा से विभाग पर इन लक्ष्यों को जमीन पर उतारने का दबाव और बढ़ गया है।

इतने बड़े आंकड़े का मतलब

आठ करोड़ से अधिक लाभार्थी का मतलब है कि राज्य की बहुत बड़ी आबादी किसी न किसी रूप में इस व्यवस्था पर निर्भर है। इतने बड़े पैमाने की व्यवस्था में थोड़ी सी चूक भी लाखों परिवारों को प्रभावित कर सकती है। इसीलिए जानकार मानते हैं कि छोटी-छोटी खामियों को दूर करना, जैसे ई-केवाईसी में दिक्कतें, आधार से सीडिंग की गड़बड़ियां या दुकानों पर समय पर राशन न पहुंचना, इस प्रणाली की विश्वसनीयता तय करता है।

पात्र-अपात्र की पहचान: दोहरी चुनौती

राशन कार्ड के मामले में दो तरह की समस्याएं सामने रहती हैं। पहली, जो पात्र हैं और जिनके नाम सूची में नहीं जुड़ पाए। दूसरी, जो अपात्र हैं लेकिन लाभ ले रहे हैं। सरकार दोनों मोर्चों पर काम करती है, यानी नए पात्र परिवारों को जोड़ना और अपात्रों की पहचान कर उन्हें सूची से हटाना। मुख्यमंत्री का जोर इसी संतुलन पर है कि जरूरतमंद छूटें नहीं और फर्जी लाभुक व्यवस्था का फायदा न उठा सकें।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ई-पॉस मशीनों से बायोमेट्रिक सत्यापन, ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन की स्थिति देखने की सुविधा, और शिकायत दर्ज करने के डिजिटल माध्यम, ये सब व्यवस्था को जवाबदेह बनाने में मददगार माने जाते हैं। मुख्यमंत्री की हालिया सीएमओ पहल, जिसमें जनता की शिकायतें सोशल मीडिया के जरिए सीधे ट्रैक करने की व्यवस्था की बात सामने आई थी, भी इसी सोच से जुड़ती दिखती है कि शिकायतों का समाधान तेज और दर्ज हो।

राशन कार्ड बनने में देरी का सबसे ज्यादा नुकसान उन परिवारों को होता है, जिनके पास आमदनी का कोई स्थायी साधन नहीं है। दिहाड़ी मजदूरों, विधवाओं, बुजुर्गों और प्रवासी कामगारों के परिवारों के लिए सस्ता अनाज महीने के बजट का बड़ा सहारा होता है। अगर सरकार वाकई कार्ड बनाने की रफ्तार बढ़ा पाती है, तो इन परिवारों की रसोई और खर्च की चिंता कुछ कम हो सकती है। साथ ही राशन कार्ड कई अन्य सरकारी योजनाओं में पहचान और पात्रता का आधार भी बनता है, इसलिए कार्ड मिलने का असर सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रहता।

खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे पर विपक्ष भी लगातार नजर रखता है, और किसी भी इलाके में राशन न मिलने या कार्ड में देरी की शिकायत राजनीतिक रंग ले सकती है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ निर्देश देने की नहीं, बल्कि उनके पालन की भी है। जनता की अपेक्षा यही है कि बैठक के निर्देश कागजों से निकलकर राशन दुकान की कतार और ब्लॉक कार्यालय की खिड़की तक असर दिखाएं।

जवाबदेही कैसे तय हो सकती है

जानकारों के मुताबिक, निर्देशों को असरदार बनाने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम जरूरी होते हैं। मसलन, राशन कार्ड के लंबित आवेदनों की जिलावार सूची सार्वजनिक की जाए, आवेदन के निपटान की समय-सीमा तय हो, राशन दुकानों का नियमित औचक निरीक्षण हो, और शिकायत मिलने पर तय अवधि में कार्रवाई हो। जिला स्तर के आपूर्ति अधिकारियों और अनुमंडल पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना भी अहम माना जाता है। ये बातें इस क्षेत्र के प्रचलित प्रशासनिक उपाय हैं, और बैठक में कौन से कदम तय हुए, इसका आधिकारिक विवरण सरकारी विज्ञप्ति से ही सामने आएगा।

अब नजर इस पर रहेगी कि मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद विभाग राशन कार्ड बनाने की रफ्तार कितनी बढ़ा पाता है और जनवितरण प्रणाली में पारदर्शिता के लिए कौन से ठोस कदम उठाता है। जिलों से आने वाली रिपोर्टें, लंबित आवेदनों की संख्या में कमी और राशन वितरण की शिकायतों में गिरावट, ये तीन संकेतक आने वाले हफ्तों में बताएंगे कि निर्देश जमीन तक कितने पहुंचे।

कुल मिलाकर, 'संकल्प' सभागार की इस बैठक ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि सरकार खाद्य सुरक्षा को अपने कल्याणकारी एजेंडे के केंद्र में रखकर चल रही है। असली कसौटी यही होगी कि राज्य के हर पात्र गरीब परिवार तक राशन कार्ड और उसके जरिए सस्ता अनाज बिना देरी और बिना गड़बड़ी के पहुंचे।

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