बिहार में औद्योगिक क्रांति की नई इबारत: बियाडा के दो चरणों में 19 जिलों में बनेंगे नए औद्योगिक क्षेत्र,CM सम्राट चौधरी के विजन को मिल रही रफ्तार

बियाडा ने दो चरणों में बिहार के 19 जिलों में नए औद्योगिक क्षेत्रों के लिए जमीन चिह्नित की है, जिसे सीएम सम्राट चौधरी के औद्योगिक आत्मनिर्भरता के विजन से जोड़ा जा रहा है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की तस्वीर!
बियाडा ने दो चरणों में बिहार के 19 से अधिक जिलों में सैकड़ों एकड़ भूमि पर नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की योजना तैयार की है।

पटना: बिहार के औद्योगिक नक्शे में अगले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (बियाडा) ने राज्य भर में नए औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार की एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की है, जिसके तहत दो चरणों में करीब 19 जिलों में सैकड़ों एकड़ जमीन पर औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जाने हैं। यह योजना मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की उस सोच से जुड़ी है, जिसमें वे बार-बार यह कहते रहे हैं कि बिहार अब सिर्फ एक कृषि प्रधान राज्य नहीं रहना चाहता, बल्कि औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन का नया केंद्र बनकर उभरना चाहता है।

पहले चरण में पांच जिलों पर फोकस

बियाडा की योजना के मुताबिक पहले चरण में पांच जिलों में नए औद्योगिक क्षेत्र प्रस्तावित हैं। भागलपुर के गोराडीह में 47.42 हेक्टेयर (करीब 117 एकड़), नवादा के रजौली में 32.92 हेक्टेयर (करीब 81 एकड़), रोहतास के डेहरी में 24.30 हेक्टेयर (करीब 60 एकड़), अरवल में 26.69 हेक्टेयर (करीब 66 एकड़) और गोपालगंज के विजयीपुर में 17.11 हेक्टेयर (करीब 42 एकड़) भूमि औद्योगिक इकाइयों के लिए चिह्नित की गई है। इस तरह पहले चरण में कुल मिलाकर करीब 148.44 हेक्टेयर यानी लगभग 367 एकड़ भूमि औद्योगिक उपयोग के लिए प्रस्तावित है, जो वर्गफुट में लगभग 1.6 करोड़ वर्गफुट के बराबर है।

दिलचस्प बात यह है कि गोपालगंज और भागलपुर को लेकर मुख्यमंत्री पहले भी सार्वजनिक रूप से घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने बताया था कि गोपालगंज में नया औद्योगिक क्षेत्र और भागलपुर में नया औद्योगिक कॉरिडोर विकसित किया जाएगा, जिसका मकसद इन इलाकों में औद्योगिक गतिविधियों को नई ऊर्जा देना और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना है। अब यह योजना भूमि चिह्नीकरण और क्षेत्रफल के स्तर पर और अधिक ठोस शक्ल लेती दिख रही है।

दूसरे और बड़े चरण में 14 जिलों को मिलेगी जगह

अगर पहला चरण पांच जिलों तक सीमित है, तो दूसरा चरण कहीं ज्यादा व्यापक और महत्वाकांक्षी नजर आता है। इस चरण में अररिया, पश्चिम चंपारण, औरंगाबाद, बांका, बेगूसराय, जहानाबाद, कटिहार, किशनगंज, मधुबनी, मुंगेर, नालंदा, नवादा, पटना, पूर्णिया और पूर्वी चंपारण — इन सभी जिलों में अलग-अलग स्थानों पर औद्योगिक भूमि चिह्नित की गई है।

इनमें सबसे बड़ा क्षेत्र पूर्वी चंपारण के बेतिया-परसा में प्रस्तावित है, जहां 53.30 हेक्टेयर यानी करीब 132 एकड़ जमीन पर औद्योगिक इकाइयां लगाई जाएंगी। इसी तरह बेगूसराय के पिपरा कोठी में 41 हेक्टेयर (करीब 101 एकड़), पूर्णिया के खुशकीबाग में 33.61 हेक्टेयर (करीब 83 एकड़) और नवादा में 35.20 हेक्टेयर (करीब 87 एकड़) भूमि औद्योगिक विकास के लिए तय की गई है। इसके अलावा बांका, मुंगेर, पटना और पूर्णिया जैसे जिलों में भी एक से अधिक स्थानों पर जमीन चिह्नित की गई है, जैसे मुंगेर जिले में संग्रामपुर और तारापुर, पटना में मसौढ़ी-धनारुआ और फतवा, तथा पूर्णिया में बेलौरी और खुशकीबाग।

दूसरे चरण में कुल मिलाकर करीब 368.12 हेक्टेयर यानी लगभग 910 एकड़ भूमि औद्योगिक इकाइयों के लिए प्रस्तावित है, जो करीब 3.96 करोड़ वर्गफुट के बराबर है। दोनों चरणों को मिला दिया जाए, तो राज्य भर में कुल मिलाकर लगभग 516 हेक्टेयर यानी करीब 1,276 एकड़ भूमि नए औद्योगिक क्षेत्रों के लिए प्रस्तावित है — एक ऐसा आंकड़ा जो बिहार के औद्योगिक इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी भूमि-योजनाओं में शुमार किया जा सकता है।

मास्टर प्लान के बाद मिलेगी जमीन आवंटन की राह

बियाडा की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह आंकड़े अंतिम नहीं हैं। दस्तावेज़ के मुताबिक, प्रत्येक औद्योगिक क्षेत्र का मास्टर प्लान तैयार होने के बाद ही प्रस्तावित भूमि को आवंटन योग्य भूमि श्रेणी में बदला जाएगा। यानी अभी दिखाया गया क्षेत्रफल केवल संकेतात्मक है और अंतिम मास्टर प्लान के आधार पर इसमें बदलाव संभव है। इसका मतलब यह है कि जमीन चिह्नित करने का काम पूरा हो चुका है, लेकिन इन क्षेत्रों में उद्योग लगाने के लिए निवेशकों को प्लॉट आवंटित करने से पहले अभी तकनीकी और योजनागत प्रक्रिया पूरी की जानी बाकी है।

सम्राट चौधरी के औद्योगिक विजन से कैसे जुड़ता है यह कदम

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार यह कहते रहे हैं कि बिहार अब देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने हाल के महीनों में कई मौकों पर बड़े औद्योगिक निवेश प्रस्तावों को मंजूरी देने और नए औद्योगिक क्षेत्रों की घोषणा करने की बात कही है। चाहे वह जमुई के चकाई में बन रहा एशिया का सबसे बड़ा एथेनॉल प्लांट हो, चकाई को स्टील हब के रूप में विकसित करने की योजना हो, या सहरसा, पूर्णिया और कैमूर में नए औद्योगिक हब विकसित करने का कैबिनेट फैसला — इन सभी कदमों से यह तस्वीर साफ होती है कि राज्य सरकार औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विस्तार को प्राथमिकता के तौर पर आगे बढ़ा रही है।

बियाडा की यह नई योजना भी उसी व्यापक रणनीति की अगली कड़ी मानी जा सकती है, जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों, खासकर वे जिले जो अब तक औद्योगिक रूप से पीछे माने जाते रहे हैं — जैसे अररिया, किशनगंज, जहानाबाद और बांका — को भी औद्योगिक मानचित्र पर शामिल करने की कोशिश की जा रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार का फोकस केवल पटना, गया या मुजफ्फरपुर जैसे पहले से विकसित औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के दूरदराज और सीमावर्ती जिलों में भी औद्योगिक विकास को पहुंचाना एक बड़ा लक्ष्य है।

रोजगार और निवेश की उम्मीदें

बियाडा पहले भी कई मौकों पर नई औद्योगिक इकाइयों को जमीन आवंटित कर करोड़ों रुपये के निवेश और हजारों रोजगार के अवसर पैदा करने का दावा करता रहा है। हाल के महीनों में बियाडा की परियोजना स्वीकृति समिति की बैठकों में कई दौर में दर्जनों औद्योगिक इकाइयों को जमीन आवंटित की जा चुकी है, जिनमें आईटी, खाद्य प्रसंस्करण, फार्मा, गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग, लेदर प्रोसेसिंग और सामान्य विनिर्माण जैसे क्षेत्र शामिल रहे हैं। ऐसे में यह माना जा रहा है कि दो चरणों में प्रस्तावित यह नई, बड़े पैमाने की भूमि-योजना आने वाले समय में इन्हीं सेक्टरों से जुड़े और भी बड़े निवेशों तथा रोजगार सृजन का रास्ता खोल सकती है।

जिलावार असमानता दूर करने की कोशिश

गौर करने वाली बात यह भी है कि इस योजना में छोटे और कम क्षेत्रफल वाले औद्योगिक क्षेत्र भी शामिल हैं, जैसे नालंदा के बिहारशरीफ-बिजवनपुर में महज 3 हेक्टेयर और जहानाबाद में 7.19 हेक्टेयर भूमि। इससे यह जाहिर होता है कि सरकार बड़े औद्योगिक गलियारों के साथ-साथ छोटे शहरों और कस्बों में भी सीमित मगर प्रभावी स्तर पर औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने की सोच पर काम कर रही है, ताकि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में एक समान औद्योगिक विकास सुनिश्चित हो सके।

आगे की चुनौतियां और संभावनाएं

हालांकि जमीन चिह्नित हो जाना औद्योगीकरण की दिशा में केवल पहला कदम है। असली चुनौती इसके बाद शुरू होती है — मास्टर प्लान को समय पर पूरा करना, भूमि अधिग्रहण और हस्तांतरण की प्रक्रिया को बिना विवाद के आगे बढ़ाना, बुनियादी ढांचे जैसे सड़क, बिजली और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना, और अंततः निवेशकों को आकर्षित कर वास्तविक उत्पादन शुरू करवाना। बिहार में पहले भी कई औद्योगिक क्षेत्रों की घोषणा के बावजूद धरातल पर काम की गति धीमी रहने की शिकायतें मिलती रही हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार सरकार इन 19 से अधिक जिलों में प्रस्तावित भूमि को कितनी तेजी से आवंटन योग्य बनाकर निवेशकों तक पहुंचा पाती है।

फिर भी, इतने बड़े भौगोलिक दायरे में और इतने बड़े क्षेत्रफल पर एक साथ औद्योगिक क्षेत्रों की योजना बनना अपने आप में इस बात का संकेत है कि बिहार सरकार लंबी अवधि की औद्योगिक रणनीति पर गंभीरता से काम कर रही है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे इन क्षेत्रों के मास्टर प्लान सामने आएंगे, यह साफ होता जाएगा कि कौन-कौन से सेक्टर इन जिलों में अपनी इकाइयां स्थापित करने के लिए आगे आते हैं और राज्य को इससे कितना आर्थिक लाभ और कितने नए रोजगार मिल पाते हैं।

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