मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी दानापुर के सरकारी स्कूल पहुंचे, क्लासरूम में बैठकर विद्यार्थियों-अभिभावकों-शिक्षकों से किया सीधा संवाद। सभी सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य करने का निर्देश दिया।
CM सम्राट चौधरी ने दानापुर के राजकीय मध्य विद्यालय में अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी में विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधे संवाद किया। बच्चों को 90% अंक लाने का लक्ष्य दिया, सभी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य करने का निर्देश दिया।
बिहार में शिक्षा व्यवस्था को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में एक और अहम पहल देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद एक सरकारी स्कूल पहुंचे और विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों के साथ आमने-सामने बैठकर बातचीत की। यह मौका था दानापुर स्थित राजकीय मध्य विद्यालय, रामजीचक, बाटागंज में आयोजित अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी-2026 का, जहां मुख्यमंत्री ने पारंपरिक मंच से भाषण देने के बजाय सीधे क्लासरूम में बैठकर तीनों पक्षों—विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक—से संवाद करने का तरीका अपनाया।
यह पहल इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि आमतौर पर बड़े नेताओं के स्कूल दौरे औपचारिक कार्यक्रमों और मंचीय भाषणों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री ने बच्चों की बेंच पर बैठकर, अभिभावकों की चिंताएं सुनकर और शिक्षकों से सीधा फीडबैक लेकर एक अलग ही उदाहरण पेश किया।

क्लासरूम में बैठकर हुआ सीधा संवाद
कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि मुख्यमंत्री ने किसी बड़े मंच या स्टेज के बजाय स्कूल के साधारण क्लासरूम को ही संवाद का केंद्र बनाया। उन्होंने विद्यार्थियों से उनकी पढ़ाई, स्कूल आने-जाने की समस्याओं और भविष्य की योजनाओं को लेकर सवाल पूछे, वहीं अभिभावकों से बच्चों की शिक्षा को लेकर उनकी अपेक्षाओं और दिक्कतों के बारे में जाना। शिक्षकों के साथ भी उन्होंने स्कूल में पढ़ाई के स्तर, संसाधनों की उपलब्धता और आने वाली चुनौतियों पर खुलकर बातचीत की।
इस तरह के सीधे संवाद से न सिर्फ जमीनी हकीकत सामने आती है, बल्कि विद्यार्थियों और अभिभावकों में भी यह भरोसा बनता है कि सरकार उनकी बात सुनने के लिए तैयार है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नीति-निर्माण के लिए इस तरह के प्रत्यक्ष संवाद कार्यक्रम बेहद उपयोगी साबित होते हैं, क्योंकि इनसे नीतियां सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी जरूरतों के हिसाब से बनती हैं।
विद्यार्थियों को 90% से ज्यादा अंक लाने की चुनौती
संगोष्ठी के दौरान मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को सीधे प्रोत्साहित करते हुए उनसे मन लगाकर पढ़ाई करने और नियमित रूप से स्कूल आने की अपील की। उन्होंने बच्चों से कहा कि वे अपने लिए एक बड़ा लक्ष्य तय करें—90% से अधिक अंक हासिल करने का। यह सिर्फ एक सामान्य नसीहत नहीं थी, बल्कि विद्यार्थियों में महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास भरने की एक कोशिश थी, ताकि वे सरकारी स्कूल में पढ़ते हुए भी निजी स्कूलों के बच्चों के बराबर या उनसे बेहतर प्रदर्शन करने की सोच रखें।
इस तरह की सीधी अपील का मनोवैज्ञानिक असर भी काफी अहम माना जाता है। जब कोई बड़ा नेता खुद बच्चों के बीच जाकर उन्हें लक्ष्य तय करने के लिए प्रेरित करता है, तो इसका असर सिर्फ उस दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चों में एक लंबे समय तक पढ़ाई के प्रति गंभीरता बनी रहती है।
नियमित स्कूल आने पर विशेष जोर
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों से यह भी कहा कि सिर्फ अच्छे अंक लाने की चाहत रखना काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए नियमित रूप से स्कूल आना भी उतना ही जरूरी है। सरकारी स्कूलों में उपस्थिति दर को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, और मुख्यमंत्री का यह सीधा आह्वान इसी समस्या को संबोधित करने की एक कोशिश माना जा रहा है। जब बच्चे नियमित रूप से स्कूल आएंगे, तभी वे पाठ्यक्रम को ठीक से समझ पाएंगे और परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।
सभी सरकारी स्कूलों में अनिवार्य होगी कंप्यूटर शिक्षा
इस संगोष्ठी की सबसे बड़ी नीतिगत घोषणा कंप्यूटर शिक्षा को लेकर रही। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि अगले शैक्षणिक वर्ष से राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की दिशा में ठोस योजना तैयार की जाए।
यह फैसला मौजूदा दौर की जरूरतों को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आज के डिजिटल युग में कंप्यूटर और तकनीकी ज्ञान किसी भी विद्यार्थी के भविष्य के लिए एक बुनियादी जरूरत बन चुका है, चाहे वह आगे चलकर उच्च शिक्षा हासिल करे या फिर सीधे रोजगार के क्षेत्र में उतरे। अभी तक ज्यादातर सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा या तो उपलब्ध नहीं है, या फिर सीमित संसाधनों के चलते बहुत प्रभावी तरीके से नहीं पढ़ाई जाती। ऐसे में अगर यह योजना ठीक तरीके से लागू होती है, तो इससे ग्रामीण इलाकों के लाखों बच्चों को शहरी बच्चों के बराबर डिजिटल शिक्षा का मौका मिल सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल राज्य में डिजिटल साक्षरता को बढ़ाने के साथ-साथ बच्चों को भविष्य की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों के लिए भी बेहतर तरीके से तैयार करेगी।
'सेवा संकल्प अभियान' और चित्र प्रतियोगिता में दिखी बच्चों की प्रतिभा
इस कार्यक्रम के दौरान एक और दिलचस्प पहलू सामने आया—'सेवा संकल्प अभियान' के तहत आयोजित की गई चित्र प्रतियोगिता। इस प्रतियोगिता में स्कूल के बच्चों ने अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करते हुए 'विकसित भारत 2047' की थीम पर आधारित चित्र बनाए। मुख्यमंत्री ने बच्चों द्वारा बनाए गए इन चित्रों को ध्यान से देखा और उनकी सोच, कल्पनाशीलता और भविष्य को लेकर उनकी समझ की खुलकर सराहना की।
यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके जरिए छोटे बच्चों को भी देश के विकास से जुड़े बड़े लक्ष्यों से जोड़ने की कोशिश की गई। जब बच्चे कम उम्र में ही 'विकसित भारत' जैसी अवधारणाओं पर सोचना और उसे चित्रों के माध्यम से व्यक्त करना सीखते हैं, तो इससे उनमें राष्ट्र निर्माण को लेकर एक सकारात्मक सोच विकसित होती है। साथ ही, इस तरह की प्रतियोगिताएं बच्चों की छिपी हुई रचनात्मक प्रतिभा को सामने लाने का भी एक अच्छा जरिया बनती हैं।
अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी रहा खास मंच
यह संगोष्ठी सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अभिभावकों और शिक्षकों को भी अपनी बात रखने का पूरा मौका मिला। अभिभावकों ने बच्चों की शिक्षा से जुड़ी अपनी उम्मीदों और चुनौतियों को साझा किया, जबकि शिक्षकों ने स्कूल में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने से जुड़े सुझाव दिए। इस तरह का त्रिपक्षीय संवाद—विद्यार्थी, अभिभावक और शिक्षक—शिक्षा व्यवस्था को समग्र रूप से समझने और सुधारने के लिए एक कारगर तरीका माना जाता है।
जमीनी स्तर पर नीति-निर्माण की दिशा में बड़ा कदम
अगर इस पूरे कार्यक्रम को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो यह सिर्फ एक स्कूल विजिट भर नहीं था, बल्कि यह सरकार की उस सोच को दर्शाता है जिसमें शिक्षा नीति को सिर्फ ऊपर से थोपने के बजाय, नीचे से यानी जमीनी स्तर से समझकर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री का क्लासरूम में बैठकर संवाद करना, बच्चों को स्पष्ट लक्ष्य देना, और कंप्यूटर शिक्षा जैसी दूरगामी नीति की घोषणा करना—यह सब मिलकर बिहार की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत देता है।
आने वाले समय में अगर यह पहल राज्य के अन्य स्कूलों में भी दोहराई जाती है, तो इससे न सिर्फ सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि विद्यार्थियों में भी पढ़ाई को लेकर एक नई ऊर्जा और लक्ष्य की स्पष्टता देखने को मिल सकती है।
निष्कर्ष
दानापुर के राजकीय मध्य विद्यालय में आयोजित यह अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी बिहार की शिक्षा व्यवस्था में एक सकारात्मक बदलाव की झलक पेश करती है। मुख्यमंत्री का सीधे क्लासरूम में जाकर बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों से संवाद करना, उन्हें स्पष्ट लक्ष्य देना और कंप्यूटर शिक्षा को अनिवार्य बनाने का निर्देश देना—ये सभी कदम मिलकर यह संकेत देते हैं कि राज्य सरकार सरकारी स्कूलों को सिर्फ इमारत या संसाधन तक सीमित न रखकर, वहां पढ़ने वाले हर बच्चे के भविष्य को गंभीरता से लेने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
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