बिहार के डैम और पहाड़ी इलाकों में इको टूरिज्म की नई इबारत: सीएम सम्राट चौधरी ने पीपीपी मोड में तेजी लाने के दिए निर्देश!

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में लोक सेवक आवास स्थित 'संकल्प' सभागार में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की समीक्षा बैठक हुई।

'संकल्प' सभागार में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की समीक्षा बैठक में डैम और पहाड़ी क्षेत्रों में इको टूरिज्म व सोलराइजेशन को पीपीपी मोड में तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।

पटना: बिहार में प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ी और जलाशय क्षेत्रों को पर्यटन के बड़े केंद्रों के रूप में विकसित करने की दिशा में राज्य सरकार ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में लोक सेवक आवास स्थित 'संकल्प' सभागार में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की समीक्षा बैठक हुई, जिसमें राज्य के विभिन्न डैम और पहाड़ी इलाकों में इको टूरिज्म, सोलराइजेशन और हरित आवरण बढ़ाने से जुड़ी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

पीपीपी मोड में मिलेगी इको टूरिज्म को रफ्तार

बैठक में मुख्यमंत्री ने साफ निर्देश दिया कि राज्य के प्राकृतिक और पर्वतीय क्षेत्रों में इको टूरिज्म तथा सोलराइजेशन से जुड़ी परियोजनाओं को जन-निजी भागीदारी यानी पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड में तेजी से आगे बढ़ाया जाए। पीपीपी मॉडल अपनाने के पीछे सोच यह है कि सरकारी संसाधनों के साथ निजी निवेश को जोड़कर इन परियोजनाओं को जल्द और बेहतर तरीके से जमीन पर उतारा जा सके। इससे न सिर्फ परियोजनाओं के पूरा होने की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि रखरखाव और संचालन में भी दक्षता आने की उम्मीद है।

चार प्रमुख डैम बनेंगे पर्यटन के नए केंद्र

बैठक के दौरान राज्य के चार प्रमुख जलाशयों को लेकर खास चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने बांका जिले के ओढ़नी डैम, मुंगेर जिले के खड़गपुर डैम, नवादा जिले के ताराकोल डैम और मुंगेर जिले के जालकुंड डैम सहित अन्य जलाशयों के आसपास पर्यटकीय सुविधाओं के विकास कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए।

इन डैमों के आसपास पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाएं विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है। खड़गपुर डैम को लेकर खास तौर पर यह चर्चा हुई कि यहां इको टूरिज्म के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार किया जाए, जिसमें पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए खास तरह के "ग्लास रूम" बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया। इस तरह की सुविधाएं पर्यटकों को जलाशय और आसपास के प्राकृतिक नजारों का अनुभव कहीं अधिक आकर्षक तरीके से करा सकती हैं।

कसरैया धार को मिलेगी इको टूरिज्म स्थल की पहचान

डैमों के अलावा मुख्यमंत्री ने खगड़िया जिले के कसरैया धार को भी इको टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित करने का निर्देश दिया है। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण पहले से ही स्थानीय स्तर पर जाना जाता रहा है, लेकिन अब तक यहां पर्यटन से जुड़ी औपचारिक सुविधाओं का विकास नहीं हो पाया था। सरकार की योजना है कि इसे व्यवस्थित तरीके से इको टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि स्थानीय स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा मिल सके और आसपास के इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिले।

पहाड़ी इलाकों में टिकाऊ विकास पर जोर

मुख्यमंत्री ने बैठक में यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी क्षेत्रों में किए जाने वाले किसी भी निर्माण या विकास कार्य में पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ सामग्री के उपयोग को प्राथमिकता दी जाए। उनका मानना है कि पहाड़ी और प्राकृतिक क्षेत्रों में तेजी से विकास करते समय पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ये प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रह सकें।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने जरूरत के मुताबिक रोप-वे के निर्माण पर भी जोर दिया। पहाड़ी इलाकों में रोप-वे जैसी सुविधाएं न केवल पर्यटकों के लिए आवागमन को आसान बनाती हैं, बल्कि ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों तक पर्यटन को पहुंचाने का एक प्रभावी जरिया भी साबित होती हैं। इससे उन इलाकों में भी पर्यटन गतिविधियां शुरू हो सकेंगी, जहां अभी तक सड़क संपर्क की कमी के कारण पर्यटक नहीं पहुंच पाते थे।

सोलराइजेशन को मिलेगा बढ़ावा

पर्यावरण और ऊर्जा के मोर्चे पर भी मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए। उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में सोलराइजेशन यानी सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्थाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया। दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में बिजली पहुंचाना अक्सर एक बड़ी प्रशासनिक और तकनीकी चुनौती रही है, और ऐसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा एक व्यावहारिक और पर्यावरण अनुकूल समाधान के तौर पर देखा जाता है। मुख्यमंत्री की यह पहल न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाएगी, बल्कि राज्य के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को भी आगे बढ़ाने में मदद करेगी।

जलाशयों के चारों ओर बड़े पैमाने पर पौधारोपण

बैठक में एक और महत्वपूर्ण निर्देश यह दिया गया कि राज्य के बड़े तालाबों और जलाशयों के चारों ओर बड़े पैमाने पर पौधारोपण का काम शीघ्र पूरा किया जाए। जलाशयों के आसपास हरित आवरण बढ़ाने से न केवल उस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता बढ़ती है, बल्कि जलाशयों के जलस्तर और जैव विविधता के संरक्षण में भी मदद मिलती है। सघन पौधारोपण से मिट्टी के कटाव को रोकने, जल संरक्षण बढ़ाने और स्थानीय पर्यावरण को संतुलित रखने में भी सहायता मिलती है।

मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिया कि इस काम में किसी तरह की देरी न हो और पौधारोपण का निर्धारित लक्ष्य जल्द से जल्द पूरा किया जाए, ताकि राज्य का समग्र हरित आवरण क्षेत्र बढ़ सके।

समन्वय पर विशेष जोर

मुख्यमंत्री ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को निर्देश दिया कि वह संबंधित अन्य विभागों, जैसे पर्यटन विभाग, जल संसाधन विभाग और नगर विकास विभाग के साथ समन्वय स्थापित करते हुए सभी कार्यों में तेजी लाए। इस तरह की बड़ी परियोजनाओं को सफलतापूर्वक अमल में लाने के लिए अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल होना बेहद जरूरी माना जाता है, क्योंकि भूमि, बुनियादी ढांचे, पर्यटन सुविधाओं और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में कई विभागों की भूमिका एक साथ शामिल होती है।

अधिकारियों ने प्रस्तुत की कार्ययोजना

बैठक के दौरान विभाग के अपर मुख्य सचिव आनंद किशोर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से विभाग के कामकाज, इको टूरिज्म और सोलराइजेशन से जुड़ी मौजूदा कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि अलग-अलग जलाशयों और पहाड़ी इलाकों के लिए अलग-अलग कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं, जिनमें स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और संभावनाओं को ध्यान में रखा गया है।

रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा

इको टूरिज्म से जुड़ी इन योजनाओं का एक बड़ा मकसद स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी है। जब किसी डैम, जलाशय या पहाड़ी क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाता है, तो वहां होटल, होमस्टे, स्थानीय गाइड, परिवहन सेवाएं, हस्तशिल्प और खान-पान से जुड़े छोटे कारोबार स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं। इससे आसपास के गांवों और कस्बों में रहने वाले लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलते हैं और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

पहले भी जताई जा चुकी है इको टूरिज्म की संभावनाओं पर प्रतिबद्धता

यह पहला मौका नहीं है जब मुख्यमंत्री ने राज्य में इको टूरिज्म को लेकर गंभीरता दिखाई हो। इससे पहले भी मुख्यमंत्री सचिवालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में उन्होंने इको टूरिज्म के लिए मास्टर प्लान तैयार करने के निर्देश दिए थे, जिसमें पीपीपी मॉडल, वेटलैंड संरक्षण और ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्थलों को इको टूरिज्म से जोड़ने पर जोर दिया गया था। उस बैठक में भी मुख्यमंत्री ने इको टूरिज्म को राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन से सीधे जोड़ते हुए समग्र रणनीति बनाने की बात कही थी। मौजूदा बैठक को उसी दिशा में उठाया गया अगला ठोस कदम माना जा सकता है, जिसमें अब विशिष्ट डैम और स्थलों के नाम के साथ कार्ययोजना को और स्पष्ट रूप दिया गया है।

पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की कोशिश

गौर करने वाली बात यह है कि इस समीक्षा बैठक में पर्यटन विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बराबर अहमियत दी गई है। टिकाऊ सामग्री के उपयोग, सोलराइजेशन और बड़े पैमाने पर पौधारोपण जैसे निर्देश यह दिखाते हैं कि सरकार केवल पर्यटन स्थलों की संख्या बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि उन्हें पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तरीके से विकसित करने पर भी ध्यान दे रही है। यह संतुलन आज के दौर में बेहद अहम माना जाता है, जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण जैसी चुनौतियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं।

आगे की राह

अब देखने वाली बात यह होगी कि ओढ़नी, खड़गपुर, ताराकोल और जालकुंड डैम सहित कसरैया धार जैसे स्थलों पर प्रस्तावित सुविधाएं कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं। पीपीपी मोड के जरिए निजी निवेश आकर्षित करने की रणनीति सफल होती है या नहीं, यह भी आने वाले महीनों में साफ होगा। इसके साथ ही रोप-वे निर्माण, सोलराइजेशन और पौधारोपण जैसे कार्यों की प्रगति पर भी राज्य भर के लोगों की निगाहें रहेंगी, क्योंकि ये परियोजनाएं न केवल पर्यटन को नई दिशा देने वाली हैं, बल्कि राज्य के पर्यावरणीय भविष्य से भी सीधे जुड़ी हुई हैं।

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