'हर घर उद्यमी, हर परिवार समृद्ध': बापू सभागार में सम्राट चौधरी ने 7,000 से अधिक लाभुकों को भेजी किस्त, बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण, 1 करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाने का संकल्प!

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पटना के बापू सभागार में उद्योग विभाग द्वारा आयोजित 'मुख्यमंत्री उद्यमी योजना' उन्मुखीकरण कार्यक्रम को संबोधित किया।

पटना के बापू सभागार में मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के उन्मुखीकरण कार्यक्रम को संबोधित करते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, मंच पर उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह और बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण
बापू सभागार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के लाभुकों के खातों में किस्त की राशि अंतरित की और बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण किया।

पटना: बिहार की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने और राज्य के युवाओं को नौकरी मांगने वाले से नौकरी देने वाला बनाने के अभियान में गुरुवार का दिन एक अहम पड़ाव साबित हुआ। राजधानी पटना के बापू सभागार में उद्योग विभाग द्वारा आयोजित 'मुख्यमंत्री उद्यमी योजना' के उन्मुखीकरण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हजारों चयनित लाभुकों को संबोधित किया। इसी मंच से उन्होंने योजना के 7,000 से अधिक लाभुकों के बैंक खातों में किस्त की राशि अंतरित की और 'बिहार MSME नीति-2026' का औपचारिक लोकार्पण भी किया। कार्यक्रम का सबसे बड़ा संदेश वह रहा, जिसे मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में दोहराया: बिहार के एक करोड़ परिवारों को उद्यमी परिवार बनाना सरकार का संकल्प है।

बापू सभागार में दिखा उम्मीदों का मेला

कार्यक्रम सुबह करीब 11 बजे शुरू हुआ। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे, जबकि उद्योग एवं खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। बापू सभागार का नजारा किसी सामान्य सरकारी समारोह से अलग था। सभागार में दूर-दराज के जिलों से आए चयनित लाभुक मौजूद थे, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं, महिलाओं और पहली बार कारोबार शुरू करने जा रहे लोगों की थी। इनमें से कोई छोटे स्तर पर फर्नीचर, खाद्य प्रसंस्करण या सिलाई-बुनाई की इकाई लगाने की योजना लेकर आया था, तो कोई सेवा क्षेत्र में अपना काम शुरू करने का सपना संजोए बैठा था। सभी की आंखों में एक ही उम्मीद थी कि सरकार की इस योजना से उनकी अपनी इकाई जमीन पर उतर सके।

7,000 से अधिक लाभुकों के खातों में पहुंची रकम

कार्यक्रम का सबसे अहम क्षण वह रहा, जब मुख्यमंत्री ने एक बटन दबाकर योजना के हजारों लाभुकों के खातों में किस्त की राशि का अंतरण किया। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक यह रकम 7,000 से अधिक चयनित उद्यमियों के खातों में सीधे भेजी गई। इस प्रक्रिया में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर प्रणाली का इस्तेमाल किया गया, जिससे बिचौलियों की गुंजाइश खत्म होती है और पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में पहुंचता है। रिपोर्टों के मुताबिक अंतरित कुल राशि लगभग 150 करोड़ रुपये के आसपास रही, और प्रत्येक लाभुक को पहली किस्त के रूप में दो-दो लाख रुपये दिए गए।

मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत राज्य के युवाओं और उद्यमियों को कुल दस लाख रुपये तक की परियोजना राशि उपलब्ध कराई जाती है। इसमें पहली किस्त के रूप में शुरुआती पूंजी दी जाती है, जिससे लाभुक अपने कारोबार की नींव रख सकें। बाद की किस्तें इकाई स्थापित होने और उसकी प्रगति के आधार पर जारी की जाती हैं। यानी यह योजना केवल पैसा बांटने की नहीं, बल्कि उद्यम की शुरुआत से लेकर उसके संचालन तक सहारा देने की व्यवस्था है।

बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण

कार्यक्रम का दूसरा बड़ा आकर्षण रहा बिहार MSME नीति-2026 का लोकार्पण। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम यानी MSME क्षेत्र किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, क्योंकि यही क्षेत्र सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को गति देता है। बिहार जैसे राज्य के लिए, जहां बड़े उद्योगों की संख्या सीमित रही है, यह क्षेत्र और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

नई नीति का उद्देश्य राज्य में छोटे और मझोले उद्यमों को आसान ऋण, बेहतर बाजार पहुंच, प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना बताया गया है। नीति के जरिए सरकार ऐसा माहौल तैयार करना चाहती है, जिसमें कोई भी इच्छुक व्यक्ति, चाहे वह गांव का हो या शहर का, अपना कारोबार शुरू कर सके और उसे आगे बढ़ा सके। नीति के लोकार्पण के साथ ही यह संकेत भी मिला कि सरकार इस क्षेत्र को आने वाले वर्षों में अपनी आर्थिक रणनीति के केंद्र में रखने जा रही है।

'1 करोड़ परिवारों को बनाएंगे उद्यमी': मुख्यमंत्री का संकल्प

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जो घोषणा की, वही इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी सुर्खी बनी। उन्होंने कहा कि सरकार का संकल्प है कि बिहार के एक करोड़ परिवारों को उद्यमी परिवार बनाया जाए। मुख्यमंत्री के मुताबिक, इसके लिए वर्ष 2030 तक का लक्ष्य तय किया गया है। यह लक्ष्य अपने आप में बेहद महत्वाकांक्षी है, क्योंकि बिहार की आबादी और परिवारों की संख्या को देखते हुए इसका मतलब है कि राज्य के बहुत बड़े हिस्से को रोजगार लेने वालों की कतार से निकालकर रोजगार देने वालों की जमात में शामिल करना।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जब किसी परिवार का एक भी सदस्य उद्यमी बन जाता है, तो उसका असर केवल उसी परिवार तक सीमित नहीं रहता। एक छोटी इकाई भी आसपास के कई लोगों को काम देती है, स्थानीय बाजार में पैसा घुमाती है और गांव-कस्बे की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है। उन्होंने कहा कि इसी सोच के साथ सरकार चाहती है कि हर घर से कोई न कोई उद्यमी निकले, ताकि बिहार के लोगों को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े।

पलायन रोकने की बड़ी रणनीति

इस पूरे अभियान का एक बड़ा मकसद राज्य से होने वाले पलायन को रोकना भी है। बिहार से हर साल बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों का रुख करते हैं। मुख्यमंत्री ने इस मौके पर दोहराया कि वर्ष 2030 तक बिहार को ऐसा राज्य बनाने की दिशा में काम हो रहा है, जहां किसी युवा को रोजगार के लिए बाहर न जाना पड़े। उद्यमी योजना और MSME नीति इसी बड़ी रणनीति के दो मजबूत स्तंभ के रूप में देखे जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अगर राज्य के भीतर ही छोटे उद्योग, स्थानीय विनिर्माण इकाइयां और सेवा क्षेत्र के कारोबार फलें-फूलें, तो लोगों को अपने गांव और घर के पास ही सम्मानजनक आजीविका मिल सकेगी। इससे परिवार भी साथ रहेगा और राज्य को भी उसकी कार्यशक्ति का पूरा लाभ मिलेगा।

'मेड इन बिहार' को मिलेगी प्राथमिकता

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की एक अहम नीति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकारी खरीद में बिहार में बने उत्पादों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि राज्य में संचालित योजनाओं और विभागों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का एक हिस्सा बिहार की इकाइयों में बने सामान से खरीदना जरूरी होगा। इससे स्थानीय उद्यमियों को एक सुनिश्चित बाजार मिलेगा, जो किसी भी नए कारोबार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है।

अक्सर नए उद्यमी पूंजी जुटाने के बाद भी इस समस्या से जूझते हैं कि उनका बना हुआ माल कहां बिकेगा। सरकारी खरीद में प्राथमिकता मिलने पर यह चिंता काफी हद तक दूर हो सकती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस नीति से स्थानीय उद्योगों को बाजार मिलेगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और 'मेड इन बिहार' ब्रांड को पहचान मिलेगी।

पहले भी कई उद्यमियों ने दिखाई है सफलता की राह

मुख्यमंत्री उद्यमी योजना कोई बिल्कुल नई शुरुआत नहीं है। इससे पहले के वित्तीय वर्षों में भी इस योजना के तहत बड़ी संख्या में लाभुकों का चयन हुआ और उन्हें किस्तें जारी की गईं। योजना के पुराने लाभुकों में कई ऐसे हैं, जिन्होंने दस लाख रुपये की परियोजना राशि से अपना कारोबार शुरू किया और आज उसे सफलतापूर्वक चला रहे हैं। मसलन, कुछ उद्यमियों ने फर्नीचर, अलमारी, बक्सा, सोफा और पलंग जैसे घरेलू उत्पाद बनाने की इकाइयां शुरू कीं, जहां अनुभवी कारीगरों की मदद से अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार किए जाते हैं और स्थानीय बाजार में बेचे जाते हैं। ऐसी सफल कहानियां नए लाभुकों के लिए प्रेरणा का काम करती हैं।

योजना का चयन और पारदर्शिता

योजना के तहत लाभुकों का चयन कंप्यूटर आधारित लॉटरी यानी रैंडमाइजेशन के जरिए किया जाता है। इससे चयन प्रक्रिया पारदर्शी रहती है और किसी तरह की सिफारिश या भेदभाव की गुंजाइश नहीं रहती। चयनित आवेदकों को आवश्यक दस्तावेज उद्यमी पोर्टल पर अपलोड करने होते हैं, जिसके बाद उनका अंतिम चयन होता है। पुराने लाभुकों के लिए भी निर्धारित समय में उपयोगिता प्रमाण-पत्र अपलोड करना जरूरी होता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दी गई राशि का सही इस्तेमाल हुआ है। यह पूरी प्रक्रिया डिजिटल पोर्टल के माध्यम से संचालित होती है, जिससे निगरानी और जवाबदेही दोनों बनी रहती हैं।

इस कार्यक्रम को 'उन्मुखीकरण' यानी ओरिएंटेशन कार्यक्रम कहा गया, क्योंकि इसका मकसद सिर्फ पैसा बांटना नहीं था। नए उद्यमियों को यह समझाना भी जरूरी होता है कि अपनी इकाई कैसे स्थापित करें, बाजार की मांग कैसे समझें, हिसाब-किताब कैसे रखें और सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे उठाएं। अधिकारियों ने इस मौके पर लाभुकों को योजना की शर्तों, किस्तों के नियम और आगे की प्रक्रिया की जानकारी दी। बहुत से लाभुक पहली बार कारोबार की दुनिया में कदम रख रहे हैं, इसलिए उनके लिए इस तरह का मार्गदर्शन बेहद उपयोगी साबित होता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं उद्योग मंत्री श्रेयसी सिंह ने भी लाभुकों को संबोधित किया और उन्हें अपनी इकाइयां जल्द से जल्द स्थापित करने की सलाह दी। उद्योग विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि विभाग का लक्ष्य है कि हर चयनित लाभुक को समय पर किस्त मिले और उसकी इकाई बिना बाधा के शुरू हो सके। विभाग की ओर से हेल्पलाइन और जिला स्तर पर सहायता केंद्रों की व्यवस्था की भी जानकारी दी गई, ताकि लाभुकों को किसी तरह की परेशानी होने पर वे सीधे संपर्क कर सकें।

उद्यमिता और औद्योगिक विस्तार का बड़ा परिदृश्य

मुख्यमंत्री उद्यमी योजना और MSME नीति को राज्य की व्यापक औद्योगिक रणनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बीते कुछ महीनों में बिहार सरकार ने कई मोर्चों पर औद्योगिक विस्तार की घोषणाएं की हैं। राज्य के अलग-अलग जिलों में नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए भूमि चिह्नित की गई है, बियाडा के जरिए उद्योगों को जमीन आवंटित की जा रही है, और बड़े निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है। इस सबके बीच छोटे और मझोले उद्यमों को सहारा देने वाली नीति एक ऐसी कड़ी है, जो बड़े उद्योगों और आम परिवारों की आर्थिक गतिविधियों को आपस में जोड़ती है।

बड़े उद्योग जहां बड़े निवेश और बड़े पैमाने के रोजगार लाते हैं, वहीं छोटे उद्यम गांव-गांव तक आर्थिक गतिविधि पहुंचाते हैं। दोनों का एक साथ विकास ही किसी राज्य को वास्तविक औद्योगिक ताकत बना सकता है। सरकार की रणनीति इसी संतुलन को साधने की दिखती है।

सरकार की इस योजना में महिलाओं और समाज के कमजोर तबकों की भागीदारी बढ़ाने पर भी खास जोर दिया जाता रहा है। विभिन्न चरणों में योजना के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अति पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला उद्यमियों के लिए अलग-अलग प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है। इसका उद्देश्य यह है कि उद्यमिता का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे और कोई भी तबका पीछे न छूटे। महिला उद्यमियों के लिए यह योजना विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इससे उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का अवसर मिलता है।

चुनौतियां भी हैं, जिन पर नजर रहेगी

हालांकि एक करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाने का लक्ष्य जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। इसके लिए सिर्फ पूंजी उपलब्ध कराना काफी नहीं होगा। नए उद्यमियों को प्रशिक्षण, कच्चे माल की आपूर्ति, बिजली-सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं, बाजार से जुड़ाव और तकनीकी मदद भी चाहिए। बहुत से छोटे उद्यम शुरुआती वर्षों में ही बंद हो जाते हैं, अगर उन्हें टिके रहने के लिए पर्याप्त सहारा न मिले। इसलिए सरकार के सामने यह चुनौती भी होगी कि वह उद्यमों की शुरुआत के साथ-साथ उनके टिकाऊ संचालन को भी सुनिश्चित करे।

विशेषज्ञों का कहना है कि MSME नीति-2026 की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसके प्रावधान जमीन पर कितनी ईमानदारी और तेजी से लागू होते हैं। बैंकों से ऋण की उपलब्धता, भुगतान में देरी की समस्या का समाधान और सरकारी खरीद में स्थानीय उत्पादों को वास्तविक प्राथमिकता, ये ऐसे पहलू हैं, जिन पर आने वाले समय में सबकी नजर रहेगी।

अगर सरकार अपने लक्ष्य के करीब भी पहुंच पाती है, तो इसका असर बिहार की अर्थव्यवस्था पर गहरा होगा। बड़ी संख्या में नई इकाइयां शुरू होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा, लोगों की आय बढ़ेगी और बाजार में मांग भी बढ़ेगी। इससे राज्य के राजस्व में भी इजाफा होगा और सरकार के पास विकास कार्यों के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। साथ ही पलायन में कमी आने से सामाजिक ढांचे पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा, क्योंकि परिवार टूटने से बचेंगे और गांवों में युवाओं की मौजूदगी बनी रहेगी।

कार्यक्रम के बाद सभागार से बाहर निकलते लाभुकों के चेहरे पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कई लोगों ने कहा कि उन्हें पहली बार लगा कि वे भी अपने दम पर कुछ कर सकते हैं। कुछ लाभुकों ने बताया कि वे अब तक दूसरे शहरों में मजदूरी या छोटी नौकरी कर रहे थे, लेकिन अब अपने गांव लौटकर अपना काम शुरू करने की योजना बना रहे हैं। उनके अनुसार, सरकार की यह मदद उनके लिए जीवन बदलने वाला अवसर साबित हो सकती है, बशर्ते उन्हें आगे भी इसी तरह सहयोग मिलता रहे।

अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि इन 7,000 से अधिक नई इकाइयों में से कितनी निर्धारित समय में स्थापित होकर उत्पादन शुरू कर पाती हैं, और बिहार MSME नीति-2026 के प्रावधान वास्तविक रूप में कितनी तेजी से लागू होते हैं। साथ ही यह भी देखना होगा कि एक करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाने का लक्ष्य किस तरह चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ता है और इसके लिए सरकार आगे और कौन-कौन सी योजनाएं या संसाधन उपलब्ध कराती है।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बापू सभागार में हुए इस कार्यक्रम ने राज्य के उद्यमिता अभियान को एक नई गति और एक स्पष्ट दिशा दी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शब्दों में, यह सिर्फ एक योजना या नीति नहीं, बल्कि बिहार को आत्मनिर्भर, समृद्ध और पलायन-मुक्त बनाने की दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि यह संकल्प कागजों से निकलकर बिहार के लाखों घरों की हकीकत कितनी बन पाता है।

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