MLC चुनाव से पहले NDA का 'शक्ति-संगम': लोक सेवक आवास में सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में जुटेंगे सभी सांसद-विधायक, बागियों की चुनौती पर भी होगा मंथन!
बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर 23 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने NDA के सभी सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों को पटना बुलाया है।
पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बैठकों का दौर तेज है, और इस बार मंच सजा है विधान परिषद चुनाव के लिए। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पूरे कुनबे को एक छत के नीचे जुटाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री आवास 'लोक सेवक' में होने वाली इस बैठक में NDA के सभी विधायकों, विधान पार्षदों और सांसदों को पहुंचने का निर्देश दिया गया है। मकसद साफ है: विधान परिषद की आठों सीटों पर जीत की पक्की रणनीति तैयार करना और चुनाव से पहले गठबंधन के भीतर उठ रही असहमति की आवाजों को शांत करना।
बैठक की तैयारी इतनी बड़ी है कि इसके लिए NDA के सभी सांसदों और विधायकों को पहले से पटना बुला लिया गया है। विधान परिषद में सत्ता पक्ष के मुख्य सचेतक संजय गांधी ने बताया कि सभी विधायकों, विधान पार्षदों और सांसदों को इस बैठक में आने के लिए कहा गया है, और आज शाम से कल सुबह तक सभी राजधानी पहुंच जाएंगे। इतने बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी यह बताती है कि गठबंधन इस चुनाव को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।
आम तौर पर विधान परिषद के शिक्षक-स्नातक चुनाव में आम विधायकों-सांसदों की भूमिका सीमित मानी जाती है, क्योंकि मतदाता पंजीकृत शिक्षक और स्नातक होते हैं। लेकिन इस बार NDA नेतृत्व ने साफ संकेत दिया है कि हर जनप्रतिनिधि को अपने-अपने क्षेत्र में मतदाताओं तक पहुंच बनाने की जिम्मेदारी निभानी होगी। विधायकों और सांसदों का स्थानीय नेटवर्क, शिक्षण संस्थानों से उनका जुड़ाव और कार्यकर्ताओं पर उनकी पकड़ इन सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
23 अक्टूबर को मतदान, 9 अक्टूबर तक नाम वापसी
चुनाव कार्यक्रम के लिहाज से यह बैठक बेहद अहम समय पर हो रही है। बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर मतदान 23 अक्टूबर को होना है, जबकि मतगणना 27 अक्टूबर को होगी। नामांकन वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर है, यानी बैठक के ठीक अगले दिन। इसके बाद चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी कि किस सीट पर कौन-कौन उम्मीदवार मैदान में रहेंगे और मुकाबला किस रूप में होगा।
इस समय-सीमा को देखते हुए बैठक का महत्व और बढ़ जाता है। नाम वापसी से पहले अगर नाराज या बागी दावेदारों को मनाया जा सका, तो गठबंधन के उम्मीदवारों की राह काफी आसान हो सकती है। यही वजह है कि बैठक को सिर्फ रणनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि 'डैमेज कंट्रोल' की आखिरी बड़ी कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
भाजपा और जदयू के चार-चार उम्मीदवार मैदान में
NDA की ओर से आठों सीटों पर उम्मीदवार उतारे जा चुके हैं, जिनमें भाजपा और जदयू के चार-चार प्रत्याशी हैं। भाजपा ने पटना शिक्षक सीट से नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक सीट से डॉ. एन.के. यादव, दरभंगा स्नातक सीट से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक सीट से नरेंद्र प्रसाद सिंह को टिकट दिया है। वहीं जदयू की ओर से पटना स्नातक सीट पर नीरज कुमार और तिरहुत स्नातक सीट पर अभिषेक झा समेत चार उम्मीदवार मैदान में हैं।
यह बराबर का बंटवारा गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी तय करता है कि हर दल को अपनी चारों सीटों पर पूरी ताकत झोंकनी होगी, क्योंकि किसी एक सीट पर चूक का मतलब आठ में से आठ सीटें जीतने के दावे को झटका लगना होगा।
पटना स्नातक सीट बनी सबसे बड़ी चुनौती
NDA के लिए सबसे संवेदनशील मोर्चा पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र बनकर उभरा है। रिपोर्टों के मुताबिक, मोकामा से विधायक अनंत सिंह ने इस सीट पर जदयू के घोषित उम्मीदवार नीरज कुमार का खुलकर विरोध किया है और वे जन सुराज समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में सक्रिय बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि बैठक में अनंत सिंह की मौजूदगी पर सबकी नजरें टिकी हैं।
अनंत सिंह के इस रुख ने गठबंधन के भीतर हलचल पैदा कर दी है। मामले को सुलझाने के लिए जदयू नेतृत्व ने भी सक्रियता दिखाई है। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने इस सिलसिले में अनंत सिंह से फोन पर बातचीत की है, जबकि जदयू के वरिष्ठ नेता नीतीश कुमार ने भी ललन सिंह के साथ बंद कमरे में चर्चा कर मामले को शांत करने की कोशिश की। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या लोक सेवक आवास की बैठक में अनंत सिंह और ललन सिंह दोनों मौजूद रहेंगे, और क्या बैठक के माहौल में यह विवाद सुलझाने की कोई राह निकल पाएगी।
यह सवाल जब मुख्य सचेतक संजय गांधी से पूछा गया कि क्या अनंत सिंह को भी बैठक में बुलाया जाएगा, तो उन्होंने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि बैठक में NDA के सभी दिग्गज नेताओं को बुलाया गया है।
गठबंधन के सामने बागी तेवरों की चुनौती केवल एक सीट या एक दल तक सीमित नहीं है। चर्चा है कि भाजपा के भीतर भी कुछ असंतुष्ट नेता निर्दलीय के तौर पर पर्चा भरने की तैयारी में थे, जिससे पार्टी नेतृत्व की चिंता और बढ़ गई थी। इसी संदर्भ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने पटना पहुंचकर पार्टी उम्मीदवारों के साथ बैठक की थी, ताकि संगठन के भीतर तालमेल दुरुस्त किया जा सके।
इन घटनाओं के बीच लोक सेवक आवास की बैठक को इसलिए खास माना जा रहा है, क्योंकि यहां दोनों प्रमुख घटक दलों के नेता एक साथ मौजूद रहेंगे और सीधे संवाद के जरिए असहमति दूर करने की कोशिश कर सकेंगे। नाम वापसी की समय-सीमा नजदीक होने के कारण यह मौका गठबंधन के लिए बेहद अहम है।
बैठक का एजेंडा: जीत की रणनीति के पांच बिंदु
बैठक से जुड़ी चर्चाओं और संकेतों के आधार पर इसके संभावित एजेंडे को पांच प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है।
पहला, आठों सीटों के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति, क्योंकि हर क्षेत्र का सामाजिक-शैक्षणिक गणित अलग है।
दूसरा, घटक दलों के बीच बेहतर समन्वय, ताकि भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हम के कार्यकर्ता एक साथ मैदान में उतरें।
तीसरा, बागी या नाराज नेताओं को मनाने की रणनीति, ताकि वोटों का बंटवारा रोका जा सके।
चौथा, मतदाताओं से सीधे संपर्क और वोट मैनेजमेंट, यानी पंजीकृत शिक्षकों और स्नातकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की ठोस योजना।
पांचवां, जिम्मेदारियों का बंटवारा, जिसमें हर सांसद, विधायक और विधान पार्षद को किसी न किसी क्षेत्र या मतदाता समूह की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
तमाम चुनौतियों के बावजूद NDA नेतृत्व आत्मविश्वास से भरा नजर आ रहा है। विधान परिषद में सत्ता पक्ष के मुख्य सचेतक संजय गांधी ने भरोसा जताया कि गठबंधन सभी आठ सीटों पर जीत हासिल करेगा। उनका कहना है कि बैठक का उद्देश्य मौजूदा रणनीति को और धार देना और सभी जनप्रतिनिधियों को एक साझा लक्ष्य के लिए एकजुट करना है।
इससे पहले भी NDA के घटक दलों के प्रदेश अध्यक्षों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय में बैठक कर एकजुटता का संदेश दिया था, जिसमें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा समेत सभी सहयोगी दलों के नेता मौजूद थे। सभी ने सभी आठ सीटों पर जीत का दावा दोहराया था।
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता के राजनीतिक मायने
बैठक की अध्यक्षता खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कर रहे हैं, और इसके राजनीतिक मायने कम नहीं हैं। गठबंधन में पांच दल हैं और हर दल की अपनी अपेक्षाएं और चिंताएं हैं। ऐसे में सरकार के मुखिया का खुद पहल करना यह संदेश देता है कि वे गठबंधन की एकजुटता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी साल मार्च में राज्यसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने अपने आवास पर NDA के सभी विधायकों की बैठक कर गठबंधन को एकजुट रखने की कवायद की थी, जो उनकी कार्यशैली को दर्शाती है।
यह भी गौर करने लायक है कि बागी तेवरों की समस्या सिर्फ NDA तक सीमित नहीं है। विपक्षी महागठबंधन में भी कुछ सीटों पर आपसी खींचतान की खबरें सामने आई हैं, जिनमें दरभंगा शिक्षक सीट पर उम्मीदवारों को लेकर मतभेद की चर्चा प्रमुख है। यानी दोनों खेमे अपने-अपने घर को संभालने में जुटे हैं। ऐसे में जो गठबंधन नाम वापसी की समय-सीमा से पहले अपने भीतर के असंतोष को बेहतर ढंग से संभाल लेगा, उसे चुनावी मैदान में बढ़त मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
इन चुनावों की प्रकृति आम चुनावों से अलग होती है। यहां मतदाता सीमित संख्या में होते हैं, लेकिन वे जागरूक और संगठित माने जाते हैं। इसलिए एक-एक वोट की कीमत बहुत अधिक होती है और छोटा-सा अंतर भी नतीजा पलट सकता है। यही कारण है कि दोनों गठबंधन निजी संपर्क, स्थानीय प्रभाव और व्यक्तिगत छवि पर खास ध्यान देते हैं। जहां बागी उम्मीदवार या निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं, वहां वोटों का बंटवारा नतीजों को सीधे प्रभावित कर सकता है।
विधानसभा की जीत के बाद पहली बड़ी परीक्षा
पिछले विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद यह NDA के लिए पहली बड़ी चुनावी परीक्षा मानी जा रही है। इन आठ सीटों के नतीजे सिर्फ विधान परिषद में संख्या बल तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी दिखाएंगे कि गठबंधन के भीतर समन्वय कितना मजबूत है और शिक्षित मतदाता वर्ग में उसकी पकड़ कितनी गहरी है। इसीलिए नेतृत्व किसी भी तरह की चूक से बचना चाहता है।
बैठक के बाद सबसे पहली नजर इस पर रहेगी कि नाम वापसी की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर तक कौन-कौन से बागी या असंतुष्ट उम्मीदवार मैदान से हटते हैं और कौन डटे रहते हैं। पटना स्नातक सीट पर अनंत सिंह का रुख क्या रहेगा, यह भी आने वाले दिनों की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बन सकता है। इसके बाद प्रचार का दौर तेज होगा और 23 अक्टूबर के मतदान तथा 27 अक्टूबर की मतगणना तक सियासी पारा चढ़ा रहेगा।
फिलहाल इतना तय है कि लोक सेवक आवास की यह बैठक NDA के लिए सिर्फ औपचारिक रणनीति सत्र नहीं, बल्कि एकजुटता की परीक्षा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई में जुट रहे सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों के सामने चुनौती है कि वे गठबंधन के भीतर की दरारों को चुनाव से पहले भर दें, ताकि आठ में आठ सीटें जीतने का दावा नतीजों में हकीकत बन सके।
No comments yet. Be the first to share your thoughts!