15 साल बाद भागलपुर में लौटी रावण दहन की परंपरा, जिला स्कूल मैदान में उमड़ी भीड़, सीएम सम्राट चौधरी के प्रति जताया आभार!
भागलपुर शहर में लगभग 15 साल बाद विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा फिर शुरू हुई। लाजपत पार्क के पास जिला स्कूल मैदान में आयोजित कार्यक्रम में 25 फीट का रावण, 20 फीट का मेघनाद और 15 फीट का कुंभकर्ण जलाया गया। बड़ी संख्या में लोग जुटे और सीता-राम व हनुमान की झांकी आकर्षण का केंद्र रही।

भागलपुर: कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं, जो सालों तक रुक जाएं तो भी लोगों की यादों में जिंदा रहती हैं। भागलपुर शहर में विजयादशमी पर रावण दहन भी ऐसी ही परंपरा थी। एक-दो साल नहीं, बल्कि करीब 15 साल तक शहर में यह आयोजन नहीं हो सका था। इस बार बुधवार की शाम जब जिला स्कूल मैदान में तीर चला और विशाल पुतले धू-धू कर जल उठे, तो वहां मौजूद भीड़ ने "जय श्रीराम" के नारों के साथ इस वापसी का स्वागत किया। यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन की वापसी नहीं थी, बल्कि शहर के लोगों के लिए एक पुरानी याद के लौट आने जैसा भी था।

शाम आठ बजे हुआ दहन, आसमान में आतिशबाजी
विजयादशमी की शाम करीब आठ बजे जिला स्कूल मैदान में रावण दहन का मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ। मंच पर भगवान श्रीराम की भूमिका निभा रहे कलाकार ने जैसे ही रावण के पुतले की ओर तीर चलाया, देखते ही देखते आग की लपटें उठने लगीं और कुछ ही पल में पुतला राख में बदलने लगा। रावण के साथ-साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी जलने लगे। चारों तरफ "जय श्रीराम" के जयकारे गूंजे और मैदान उत्सव के माहौल में डूब गया।
पुतलों के जलने के दौरान आसमान में आतिशबाजी भी की गई, जिसने लोगों का उत्साह और बढ़ा दिया। बच्चे कंधों पर चढ़कर यह नजारा देखते दिखे और बड़े-बुजुर्गों के चेहरों पर बीते वक्त की यादें ताजा होने का एहसास साफ नजर आया।
तीन पुतले: 25, 20 और 15 फीट
आयोजन के लिए तीन अलग-अलग ऊंचाई के पुतले तैयार कराए गए थे। रावण का पुतला सबसे ऊंचा, करीब 25 फीट का था। उसके बेटे मेघनाद का पुतला लगभग 20 फीट ऊंचा बनाया गया था, जबकि कुंभकर्ण का पुतला करीब 15 फीट का था। तीनों पुतलों को एक साथ खड़ा देखकर ही मैदान में पहुंचे लोगों की भीड़ में उत्सुकता की लहर दौड़ गई थी। रामलीला की परंपरा में ये तीनों पात्र बुराई और अहंकार के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए तीनों को एक साथ जलाना इस पर्व की मूल भावना को दर्शाता है।
सीता-राम और हनुमान की झांकी रही आकर्षण का केंद्र
रावण दहन से पहले मैदान में सजी झांकियों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। खासकर सीता-राम और हनुमान की झांकी सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रही। परिवारों के साथ पहुंचे लोग झांकी के सामने खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाते दिखे, तो श्रद्धालु हाथ जोड़कर दर्शन करते नजर आए। इस तरह कार्यक्रम सिर्फ पुतला दहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे आयोजन में धार्मिक श्रद्धा और सांस्कृतिक रंग दोनों का मेल दिखा।
वार्ड 20 के पार्षद की पहल: नंदिकेश शांडिल्य के नेतृत्व में आयोजन
इस दशहरा उत्सव का आयोजन वार्ड संख्या 20 के पार्षद नंदिकेश शांडिल्य के नेतृत्व में किया गया। आयोजक होने के साथ-साथ स्थानीय पार्षद की भूमिका में उन्होंने इस कार्यक्रम को शहर में वापस लाने की जिम्मेदारी निभाई। उनके नेतृत्व में तैयारियां कई दिनों से चल रही थीं, जिसमें पुतलों का निर्माण, मंच और झांकी की व्यवस्था, सुरक्षा इंतजाम और भीड़ प्रबंधन जैसे कई काम शामिल थे।
कार्यक्रम में शहर के कई प्रमुख जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी मौजूद रहे। भागलपुर के विधायक रोहित पांडेय, मेयर डॉ. बसुंधरा लाल और एसडीएम विकास कुमार समेत कई अतिथि कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। इनके अलावा भाजपा के जिलाध्यक्ष संतोष कुमार साह, डॉ. बिहारी लाल, पार्षद अश्वनी जोशी मोंटी, विश्वकर्मा महासंघ के अध्यक्ष विशाल आनंद और गिरीश चंद्र झा भी आयोजन में शामिल हुए। इतने सारे गणमान्य लोगों की उपस्थिति से यह साफ झलका कि इस आयोजन को शहर के अलग-अलग तबकों का समर्थन मिला है।
'सिर्फ धार्मिक नहीं, सामाजिक परंपरा भी': आयोजक की बात
आयोजक और स्थानीय पार्षद नंदिकेश शांडिल्य ने इस मौके पर कहा कि रावण दहन सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक परंपरा भी है। उनके अनुसार यह कार्यक्रम लोगों को पुराने मतभेद भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलने का मौका देता है और समाज में भाईचारा बढ़ाने का संदेश देता है।
यह बात दशहरे की पूरी भावना को समझने में मदद करती है। विजयादशमी का पर्व आमतौर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसके साथ मेल-मिलाप का भाव भी जुड़ा होता है। कई जगहों पर इस दिन लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और पुरानी कड़वाहटों को पीछे छोड़कर नए सिरे से रिश्ते निभाने का संकल्प लेते हैं।
क्यों बंद हो गई थी परंपरा
रिपोर्टों के अनुसार करीब 15 साल पहले तक शहर में रावण दहन का आयोजन होता था। लेकिन सुरक्षा इंतजामों की चुनौतियों, आयोजन के लिए उपयुक्त जगह की कमी और कुछ अन्य कारणों से यह परंपरा रुक गई थी। बड़े पुतले जलाने के लिए खुला मैदान जरूरी होता है, जहां भीड़ को सुरक्षित दूरी पर रखा जा सके और आग से किसी तरह का नुकसान न हो। शहरों में जैसे-जैसे आबादी और निर्माण बढ़ा, ऐसे खुले मैदान मिलना मुश्किल होता गया, और बढ़ती भीड़ के बीच सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बड़ी चुनौती बनती गई।
इस बार लाजपत पार्क के पास जिला स्कूल मैदान में आयोजन का फैसला किया गया। खुली जगह होने की वजह से यहां पुतले खड़े करना, दर्शकों को व्यवस्थित बैठाना और सुरक्षा व्यवस्था संभालना अपेक्षाकृत आसान रहा। प्रशासन और आयोजकों के तालमेल से यह संभव हो सका कि आखिरकार 15 साल का इंतजार खत्म हुआ।
इस आयोजन की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इसमें दो पीढ़ियों की अलग-अलग भावनाएं एक साथ दिखीं। जिन लोगों ने 15 साल पहले शहर में रावण दहन देखा था, उनके लिए यह बीते दौर की यादों में लौटने जैसा था। कई बुजुर्ग बताते दिखे कि उन्हें अपने बचपन और जवानी के दशहरे याद आ गए। वहीं बच्चों और युवाओं के लिए, जिनमें से कई ने पहली बार अपने शहर में इतने बड़े स्तर पर रावण दहन देखा, यह एक नया और रोमांचक अनुभव था।
सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का एक तरीका यही होता है कि पुरानी पीढ़ी अपनी स्मृतियां नई पीढ़ी तक पहुंचाए और नई पीढ़ी उसे अपना बना ले। इस लिहाज से जिला स्कूल मैदान का यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि परंपरा के हस्तांतरण का एक छोटा-सा उदाहरण भी माना जा सकता है।
विजयादशमी के आसपास भागलपुर में सिर्फ रावण दहन ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक आयोजन भी चर्चा में रहे। रिपोर्टों में शहर में शोभायात्रा निकाले जाने की जानकारी भी सामने आई, जो ललमटिया चौक से चंपापुल तक निकलनी थी। इससे जाहिर होता है कि इस साल दशहरे के उत्सव का दायरा शहर में कई जगहों पर फैला रहा।
मुख्यमंत्री के प्रति आभार, सनातन संस्कृति के संरक्षण का संदेश
इस आयोजन के बाद सोशल मीडिया पर साझा किए गए संदेशों में इसे सनातन संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक सराहनीय पहल बताया गया है। संदेश में कहा गया है कि सालों से बंद पड़ी रावण दहन की परंपरा का फिर से शुरू होना हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम कदम है। इसी क्रम में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के प्रति भी हार्दिक आभार और धन्यवाद जताया गया है।
यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि इस आयोजन की समाचार रिपोर्ट में आयोजन का श्रेय स्थानीय पार्षद और आयोजन समिति की पहल को दिया गया है, जबकि मुख्यमंत्री के प्रति आभार सोशल मीडिया संदेश में व्यक्त की गई भावना है। यानी यह राजनीतिक और सामाजिक तौर पर पार्टी समर्थकों और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया का हिस्सा है।
भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का राजनीतिक रंग लेना कोई नई बात नहीं है। रावण दहन जैसे आयोजनों में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी इस बात को दर्शाती है कि वे जनता से सीधे जुड़ने का मौका नहीं छोड़ना चाहते। लेकिन ज्यादातर लोग इसे सकारात्मक रूप में भी देखते हैं, क्योंकि जनप्रतिनिधियों की भागीदारी से प्रशासनिक सहयोग मिलता है और आयोजन सुचारू रूप से हो पाता है।
आयोजन के राजनीतिक पहलू से अलग देखें तो असली संदेश वही है, जो आयोजकों ने सामने रखा: त्योहारों को पुराने मतभेद भुलाने का मौका बनाना और समाज में भाईचारा बढ़ाना। चाहे किसी भी दल या विचारधारा के लोग हों, जब वे एक मैदान में एक साथ खड़े होकर उत्सव में शामिल होते हैं, तो आपसी दूरियां कम होती हैं।
रावण दहन की परंपरा रामायण की उस कथा से जुड़ी है, जिसमें भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत स्थापित की थी। रावण को अहंकार, अन्याय और अत्याचार का प्रतीक माना जाता है, जबकि राम मर्यादा, धर्म और सत्य के प्रतीक हैं। इसलिए हर साल पुतला जलाना सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें खत्म करने की प्रेरणा भी है। कई लोग इसे इस रूप में भी देखते हैं कि पुतला जलाते समय हर व्यक्ति को अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को भी त्यागने का संकल्प लेना चाहिए।
सुरक्षा और व्यवस्था की चुनौती
बड़े आयोजनों में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सुरक्षा की होती है। पुतलों में आग लगाना, पटाखे और आतिशबाजी चलाना, और हजारों की भीड़ को नियंत्रित रखना, ये सब ध्यान से संभालने पड़ते हैं। भागलपुर के आयोजन में अधिकारियों और आयोजकों की मौजूदगी से यह संकेत मिलता है कि व्यवस्था पर नजर रखी गई। आगे के आयोजनों में भी अग्निशमन व्यवस्था, एंबुलेंस, बैरिकेडिंग और भीड़ प्रबंधन पर खास ध्यान देना जरूरी रहेगा।
15 साल बाद शुरू हुई इस परंपरा को लेकर अब सवाल यह है कि क्या अगले वर्षों में भी यह सिलसिला जारी रहेगा। स्थानीय लोगों की अपेक्षा यही है कि इस बार की सफलता को देखकर आयोजक और प्रशासन इसे हर साल आयोजित करने की योजना बनाएं। इसके लिए पुतलों की व्यवस्था, मैदान की उपलब्धता, सुरक्षा और आयोजन समिति का स्थायी ढांचा जैसी चीजें पहले से तय करने की जरूरत पड़ेगी। अगर ऐसा हुआ, तो भागलपुर का यह दशहरा आने वाले समय में शहर की पहचान बन सकता है।
फिलहाल जिला स्कूल मैदान से लौटती भीड़ की जुबान पर यही बात थी कि बरसों बाद शहर में दशहरे का वैसा माहौल दिखा, जैसा पहले हुआ करता था। परंपराओं की वापसी का यह छोटा-सा क्षण भागलपुर के लोगों के लिए इस साल की विजयादशमी को खास बना गया।
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