बापू सभागार में 'भावांजलि': मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने देखी माँ शारदा की स्तुति और बिहार की सांस्कृतिक विरासत की झलक

नवरात्रि के अवसर पर बापू सभागार में आयोजित 'भावांजलि' कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिरकत की। उन्होंने माँ शारदा की स्तुति, शास्त्रीय व लोक प्रस्तुतियों के जरिए बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निहारा और कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।

'भावांजलि' कार्यक्रम में मंच से दर्शकों को संबोधित करते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने बिहार की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने पर जोर दिया।

पटना। शारदीय नवरात्रि की भक्ति और उल्लास के बीच बापू सभागार में आयोजित 'भावांजलि' कार्यक्रम ने श्रद्धा, संगीत और संस्कृति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस आयोजन में विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने माँ शारदा की स्तुति और बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर आधारित प्रस्तुतियों को आत्मीयता के साथ देखा और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

पारंपरिक वेशभूषा में बिहार की लोक संस्कृति पर आधारित नृत्य प्रस्तुत करते कलाकार, सामने बैठे दर्शक।
पारंपरिक वेशभूषा में बिहार की लोक संस्कृति पर आधारित नृत्य प्रस्तुत करते कलाकार, सामने बैठे दर्शक।

भक्ति के रंग में रंगा सभागार

कार्यक्रम की शुरुआत से ही सभागार का वातावरण भक्तिमय रहा। मंच की सज्जा में माँ शारदा की छवि, पुष्प, दीप और पारंपरिक अलंकरण का सुंदर समन्वय दिखा। जैसे-जैसे प्रस्तुतियाँ आगे बढ़ीं, दर्शकों की तालियों और जयकारों से पूरा सभागार गूंज उठा।

मुख्यमंत्री के सभागार पहुँचने पर आयोजकों और कलाकारों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने सबसे पहले माँ शारदा की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके बाद वे दर्शक दीर्घा में बैठकर देर तक प्रस्तुतियाँ देखते रहे।

माँ शारदा की स्तुति से हुआ आरंभ

'भावांजलि' की पहली प्रस्तुति माँ शारदा की स्तुति रही। विद्या, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी के प्रति समर्पित इस वंदना में स्वर और भाव का सुंदर मेल देखने को मिला। शास्त्रीय संगीत की मर्यादा और भक्ति की सहजता, दोनों इसमें साथ-साथ चलती दिखीं।

नवरात्रि में शक्ति की उपासना के साथ ज्ञान और कला की साधना का भी विशेष महत्व माना जाता है। इसी भावना को केंद्र में रखकर इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। आयोजकों के अनुसार 'भावांजलि' का उद्देश्य केवल एक सांस्कृतिक संध्या सजाना नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं, लोकगीतों और आध्यात्मिक धरोहर से जोड़ना भी था।

बिहार की सांस्कृतिक विरासत की झलक

स्तुति के बाद मंच पर बिहार की लोक और शास्त्रीय परंपराओं की विविध छटाएँ उतरती गईं। कलाकारों ने लोकगीत, भक्ति गायन और नृत्य के माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत किया। मिथिला की चित्रकला से प्रेरित मंच-सज्जा और पारंपरिक वेशभूषा ने प्रस्तुतियों को और आकर्षक बनाया।

बिहार की धरती का सांस्कृतिक इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ की मिट्टी ने ज्ञान, अध्यात्म और कला की अनेक धाराओं को जन्म दिया है। बुद्ध और महावीर की यह भूमि हो या मिथिला की लोककला, मगध का गौरवशाली अतीत हो या भोजपुरी और मैथिली लोकगीतों की मिठास, ये सब मिलकर बिहार को विशिष्ट पहचान देते हैं। 'भावांजलि' में इसी बहुरंगी परंपरा को एक मंच पर लाने का प्रयास दिखा।

कलाकारों की प्रस्तुतियों के दौरान मुख्यमंत्री बीच-बीच में तालियों से उनका उत्साह बढ़ाते रहे। कई प्रस्तुतियों के बाद उन्होंने कलाकारों से सीधे संवाद भी किया।

मुख्यमंत्री का संबोधन

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने नवरात्रि की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि माँ की आराधना का यह पर्व शक्ति, साधना और सद्भाव का संदेश देता है। ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करते हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार की संस्कृति हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। इसे सहेजना और आगे बढ़ाना सरकार और समाज, दोनों की साझा जिम्मेदारी है। उनके अनुसार कला और संस्कृति केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि समाज की आत्मा हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मूल्यों को आगे ले जाती हैं।

मुख्यमंत्री ने युवा कलाकारों की प्रतिभा की सराहना की और कहा कि राज्य में कला प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जरूरत है उन्हें उचित मंच और अवसर देने की। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहेगी।

कलाकारों में उत्साह

मंच पर प्रस्तुति देने वाले कलाकारों ने इसे अपने लिए गौरव का क्षण बताया। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति से कलाकारों का मनोबल बढ़ा है। कई युवा कलाकारों ने कहा कि ऐसे बड़े मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करना उनके लिए प्रेरणादायी अनुभव रहा।

दर्शकों में बड़ी संख्या में कला प्रेमी, संस्कृतिकर्मी, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक मौजूद थे। कार्यक्रम के अंत में पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। कई दर्शकों ने कहा कि नवरात्रि के पावन अवसर पर इस तरह का आयोजन मन को शांति और ऊर्जा देने वाला रहा।

बापू सभागार: सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र

पटना का बापू सभागार लंबे समय से राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ संगीत संध्याएँ, नाट्य प्रस्तुतियाँ, साहित्यिक आयोजन और सरकारी कार्यक्रम होते रहे हैं। नवरात्रि जैसे पर्व पर यहाँ 'भावांजलि' जैसा आयोजन होना इस मंच की उस भूमिका को और पुष्ट करता है।

नवरात्रि और संस्कृति का संबंध

नवरात्रि केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं है। यह संगीत, नृत्य, कथा और लोकपरंपराओं का भी उत्सव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। बिहार में भी दुर्गा पूजा के साथ भजन-कीर्तन, जागरण, सांस्कृतिक संध्याओं और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा रही है। 'भावांजलि' इसी परंपरा का आधुनिक मंच पर विस्तार माना जा सकता है।

माँ शारदा को ज्ञान और कला की देवी के रूप में पूजा जाता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान उनकी स्तुति का एक अलग महत्व है। जब शक्ति की उपासना के साथ विद्या और कला की आराधना भी जुड़ती है, तो पर्व का अर्थ और व्यापक हो जाता है। यही संदेश इस कार्यक्रम की प्रस्तुतियों में बार-बार उभरकर सामने आया।

समापन और आभार

कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया और सभी कलाकारों, सहयोगियों और दर्शकों को धन्यवाद दिया। मुख्यमंत्री ने भी आयोजन समिति को बधाई दी और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते रहने की अपेक्षा जताई।

इस प्रकार नवरात्रि की संध्या पर बापू सभागार में 'भावांजलि' श्रद्धा, कला और संस्कृति की एक यादगार शाम बनकर संपन्न हुई, जिसमें माँ शारदा की स्तुति से लेकर बिहार की लोकधरोहर तक हर प्रस्तुति ने दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी।

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